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भारत मैं संसदिये लोकतंत्र के समक्ष उभरती चुनोटिया

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 कृतिदेव वस्तुतः भारत में संसदीय लोकतंत्र की परम्परा सदियों पुरानी है और इसका उल्लेख विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में मिलता है। वैदिक युग में सभा और समिति की स्थिति वर्तमान लोकसभा की तरह ही थी जो निर्वाचित लोगों की एक संस्था होती थी। जातक कथाओं में भी निर्वाचित राजाओं का उल्लेख हुआ है और कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में जनता के अधिकारों की बात की है। ये संस्थाऐं मध्य युग में आकर कुछ गिरावट की तरफ चली गई, क्योंकि मुगल शासकों ने स्थानीय संस्थाओं को और लोकतांत्रिक परम्पराओं को अधिक महत्व नहीं दिया। परन्तु भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के बाद इस दिशा में काफी प्रगति हुई और 1858 के एक्ट के बाद भारत के राजनैतिक इतिहास में निर्णायक मोड़ आया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में शासन करने के लिए कई महत्वपूर्ण अधिनियम पास किए, जिनमें से अंतिम व महत्वपूर्ण अधिनियम 1935 में पारित हुआ और इसका प्रभाव भारतीय संविधान पर व्यापक रूप से पड़ा। इसका अनुसरण करते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने संसदीय परम्पराओं को इस प्रलेख में जगह दी तथा आजादी के बाद भारत के शासकों ने जन-प्रतिनिधित्व को स्वीकारते हुए संसदीय लोकतंत्र को नई दिशा में ले जाने का कार्य किया। यद्यपि 1989 के बाद गठबंधन की राजनीति में संसदीय परम्पराओं पर कुठाराघात हुआ, लेकिन 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार ने संसदीय लोकतंत्र को नई दिशा देने का कार्य किया है। यहां

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