लोक साहित्य की अवधारणा

नीरजा सिंह

Abstract


लोक साहित्य किसी भी लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग होता है | यदि संस्कृति को एक विशाल वृक्ष माना जाए तो लोक साहित्य उसकी एक महत्वपूर्ण शाखा के रूप में विद्यमान रहता है | संस्कृति को एक शरीर के समान मान लिया जाए तो लोकसाहित्य शरीर का अवयव बनकर रहता है | लोक संस्कृति का क्षेत्र अत्यंत व्यापक होता है | लोक साहित्य संस्कृति की अपेक्षा कुछ संकुचित रुप में उपस्थित होता है, पर उस संस्कृति का पूर्ण रूप उस साहित्य में विद्यमान होता है | अगर लोकसाहित्य को अंग मान लिया जाए तो लोक संस्कृति अंगी है |

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