स्त्री मुक्ति का स्वर व 'चाक' उपन्यास

नीरजा सिंह

Abstract


    साहित्य के क्षेत्र में विमर्श की संकल्पना आधुनिक काल की देन है | आज साहित्य में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, सत्ता विमर्श, जाति विमर्श की संकल्पनाएं काफी रूढ़ होती हुई दिखाई देती है| इसमें भी स्त्री विमर्श को लेकर बड़े पैमाने पर चर्चा व साहित्य रचना हो रही है|स्त्रियों के प्रति सदियों से चले आ रहे शोषण व दमन के प्रति स्त्री की जागरूकता व सजगता ने साहित्य के क्षेत्र में स्त्री विमर्श को जन्म दिया है| आत्म चेतना, आत्म सम्मान, स्वाभिमान, आत्म-गौरव, समानता का दूसरा ही नाम है-स्त्री विमर्श| स्त्री को अपने अस्तित्व बोध ने विमर्श की प्रेरणा दी है| आज पुरुष की सत्ता और एकाधिकार के माहौल से स्त्री को बाहर लाने का श्रेय स्त्री विमर्श को ही दिया जा सकता है| डॉ. अर्जुन चव्हाण के अनुसार- “यह स्त्री विमर्श अपनी अस्मिता की पहचान स्वर्ग की चिंता अस्तित्व बोध और अधिकार को जलाने और बतलाने का विचार चिंतन है|यह सदियों से स्थापित पुरुष मानसिकता का तर्पण है, भावुक स्त्री का समर्पण नहीं |”1


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